मज़हब -मैं अपनी कथा आपके विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं -हरीश जायसवाल

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Mazahab - religion never be a hurdle for huminity

मज़हब 

ढ़ोलक की थाप और महिलाओं की हंसी ठिठौली के बीच मंगलगान चल रहा था .सिद्धी दुल्हन बनी दूसरे कमरे में बैठी थी .ससुराल में आज उसका यह पहला दिन था .कुछ ही देर में उसकी मुंह दिखाई की रस्म होने वाली थी .वह अपने भारी भरकम लिबास में सिमटी हुई सी बैठी सोच रही थी शहर के एक कोने से दूसरे कोने तक आने में उसे तेईस साल लग गये .हां,उसका मायका इसी शहर में था .

चलो सिद्धी बेटे रस्म का समय हो गया.सभी इंतजार कर रहे है.”सास आ कर स्नेहपूर्ण स्वर में बोली.

“जी”कह कर सिद्धी खड़ी हो गई.वह भी घंटों से एक जगह बैठे बैठे अकड़ सी गई थी.इस बहाने कम से कम शरीर तो सीधा हो ही जायगा.सिद्धी यंत्रवत अपनी सास के पीछें अगले कमरे में आ गई.
“अरे वाह बहुत सुन्दर है बहु .बधाई हो.”पास कड़ी एक महिला नेग देते हुए बोली.
“कितनी नाजुक.एकदम गुड़िया जैसी है.”दूसरी तारीफ करते हुए बोली.
“क्या नाम है तुम्हारा?”तीसरी ने प्रश्न दागा.
“जी,सिद्धी.”सिद्धी ने जवाब दिया.


वाह,क्या आवाज है.गाना वाना गाती हो क्या?”उसने फिर पूछा.


“अरे,अरे परेशान मत करो बेचारी को.वैसे ही थक कर आयी है.हाँ,पर इतनी बात तो है सिद्धी जितनी सुन्दर है उतनी ही किस्मत वाली भी है हम सब के लिये.बहुत शुभ है कदम इस घर के लिये.”सिद्धी की सास बीच में हस्तक्षेप करते हुए बोली.
“आप लोगों के लिये किस्मत वाली?वो कैसे?”उस महिला ने आश्चर्य से पूछा.

“देखो अभी शादी को कुछ ही घंटे गुजरे है कि साधक के ऑफिस से सूचना आई है कि उसका प्रमोशन हो गया है और अब मैनेजर बन गया है.तनखा भी लगभग दस हजार रुपये बढ़ गई हैं.”सास चहकते हुए बोली.

अरे वाह दोहरी बधाई.”कई महिलाऐं एक साथ बोल पड़ी.
“पर एक दुख की बात भी है.प्रमोशन के साथ साथ उसका ट्रांसफर भी हो गया है.”सास कुछ निराश होते हुए बोली.

तो क्या सिद्धी साधक के साथ चली जायगी?”एक महिला ने प्रश्न किया.


“अरे नहीं उसे तो कम से कम एक साल तक अपने साथ रखूंगी इस घर के कायदे कानून,तीज त्यौहार और रस्म रिवाज सिखाने के लिये.वैसे भी साधक का ट्रांसफर जहां पर हुआ है वह जगह यहां से डेढ़ सौ किलोमीटर तो दूर ही है.हफ्ते में एक बार या जब भी छुट्टी होगी आ जाया करेगा.पास में अपनी कार तो है ही.”सास ने जवाब दिया.
“आपकी सबसे नज़दीकी पड़ौसन मिसेस अंसारी नहीं दिखाई पड़ रहीं हैं.”एक महिला ने सिद्धी की सास से पूछा.


अरे राम का नाम लो.मैंने उस धरम बिगाड़ू को बुलाया ही नहीं.वह तो रो हाउसिंग है वर्ना मैं अपने घर की दीवाल ही अलग करवा लेती.”सिद्धी की सास कुछ बनावटी गुस्से से बोली.
रस्म पूरी होते ही सभी महिलाऐं धीरे धीरे चली गई . 
रात को जब सिद्धी व साधक एकांत में मिले तो दोनों ने एक दूसरे को बधाईयां दी .क्योंकि प्रमोशन हो गया है यह बात सिद्धी को भी मालूम नहीं थी .सिद्धी भी अपनी सास की इस बात से सहमत थी की उसे कुछ समय अपने सास ससुर के साथ ही रहना चाहिये ताकि वह नये घर के तौर तरीके .पसंद नापसंद जान सके .


बातों ही बातों में सिद्धी ने पूछा “यह अंसारी जी कौन है ?”


अंसारी जी हमारे पड़ौसी हैं.उनकी व हमारी दीवार एक ही हैं.”साधक ने बताया”पर क्यों पूछ रही हो?”
“क्योंकि मुंह दिखाई के लिये आयी महिलाऐं पूछ रही थी.क्या हमने उन्हें शादी में भी नहीं बुलाया?”सिद्धी ने फिर पूछा.


नहीं.वो ठहरे मांसाहारी और हम शुद्ध शाकाहारी.उनके और हमारे रीति रिवाज अलग.हम मूर्ति पूजक उनका तो धर्म ही अलग.माँ का मानना है उनके आने से घर अपवित्र हो जायगा.पहले तो थोड़ी बहुत दुआ सलाम हो जाया करती थी.परन्तु कुछ पहले एक कुत्ता कहीं से हड्डी उठा लाया और अपने दरवाज़े के सामने छोड़ गया.तब माँ ने अंसारी आंटी को खूब खरी खोटी सुनाई.यद्यपि अंसारी आंटी कहती रहीं की उनके घर नॉनवेज बना ही नहीं.परन्तु माँ ने उनकी बातों को सही माना ही नहीं.और तब से माँ उनके घर की तरफ देखती भी नहीं.”साधक ने पूरी बात बताई.
“क्या तुम भी ऐसा ही मानते हो साधक?”सिद्धी ने पूछा.


बिलकुलनहीं.बल्कि उनका लड़का आदिल मेरी ही उम्र का है और हम स्कूल स्तर तक साथ साथ खेलते पढ़ते रहे है माँ की जानकारी के बगैर.मुझे तो अंसारी परिवार बहुत ही शरीफ़ और ज़हीन लगता है.अंसारी आंटी खुद बहुत अच्छा व्यवहार करती हैं.पूरी तौर पर धार्मिक है परन्तु धर्म को सम्बन्धो पर हावी नहीं होने देती है.माँ को समझाना नामुमकिन है इसी कारण सम्बन्धो में कड़ा पन है.”साधक ने अपने विचार रखें.


साधक तुम को मालूम है सबसे नजदीकी रिश्तेदार एवं सहायक कौन होता है?पड़ौसी ही ना?तो फिर उनसे तो अच्छे सम्बन्ध होने ही चाहिये ना.”सिद्धी ने जोर दे कर कहा.


“मैं जानता हूं सिद्धी.अंसारी आंटी भी इस बात को जानती है इसी कारण कई सालों तक वह आदिल को हर दीपावली दशहरे पर मां पिताजी के पैर छूने के लिये भेजती रहीं हैं.मुझे भी हर ईद पर आदिल के साथ बुलावा भेजती.परन्तु माँ कभी झुकी नहीं.अब तुम चाहो तो कुछ सकारात्मक कर सकती हो.क्योंकि साल भर बाद ही सही पर तुम मेरे साथ चली जाओगी तब इमर्जेन्सी के लिये कोई तो नजदीक होना ही चाहिये.”साधक ने आशा भरी नजरों से सिद्धी की तरफ देखा.

“बिलकुल मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करुँगी.”सिद्धी ने साधक को आश्वस्त किया.
दूसरे दिन सुबह अपनी आदत के मुताबिक सिद्धी जल्दी से नहा ली .नई दुल्हन थी इसके लिये किचन वगैरह का का कोई काम नहीं था .दिसम्बर का सर्दीला महिना होने के कारण सिद्धी ठण्ड से कंपकंपा रही थी .नई बहु होने के कारण आगे जा नहीं सकती थी .अतः माँ के आदेश पर साधक सिद्धी को ले कर घर की छत पर धूप में आ गया .


रो हाउस होने के कारण से सभी घरों की छतें आपस में जुड़ी हुई थी .बीच में किसी तरह की दीवार नहीं थी .छत पर पहुंचते ही सिद्धी ने देखा एक मुस्लिम महिला पहले से ही धूप सेंक रही है .साधक कुछ बोलता उस से पहले ही सिद्धी यह समझ चुकी थी कि यह मिसेस अंसारी है .उम्र उसकी सास की ही बराबर सैंतालीस अड़तालीस साल की होगी .


सिद्धी ने तुरंत आगे बढ़ कर मिसेस अंसारी के पैर छू लिये और बोली “आप अंसारी आंटी है ना?मैंने साधक से आपके बारे में पूरी जानकारी ले ली है .मैं आपकी बहु हूं और मेरा नाम सिद्धी हैं .”
“अल्लाह तुम्हें हमेशा खुश रखे,आबाद रखें.”मिसेस अंसारी सिद्धी को आशीष देती हुई बोली”अगर मुझे पता होता की तुमसे मुलाकात होगी तो तुम्हारा शगुन जरुर ले कर आती.”
“अम्मी आपका आशीर्वाद ही मेरा शगुन है.”सिद्धी जवाब में बोली.
“मेरी दुआऐं तो हमेशा तुम्हारे साथ हैं.तुम अभी नहा कर निकली हो इस कारण तुम्हें ज्यादा ठंड लग रही होगी.मैं नीचे जाती हूँ.अगर साधक की माँ को पता चल गया तो वह बेहद नाराज़ होंगी.तुम दस मिनट यहीं ठहरना मैं आदिल के हाथों ऊपर शगुन भिजवाती हूँ.”मिसेस अंसारी ने नीचे जाते हुए कहा.

अरे नहीं नहीं आंटी यह सब मत कीजिये.”सिद्धी ने अनुरोध किया.


नई दुल्हन को बिना शगुन के नहीं देखते.शगुन तुम्हारा हक़ है.तुम रुकना मैं भिजवाती हूं.”मिसेस अंसारी जोर दे कर अपनेपन से बोली.
कुछ ही देर में आदिल छत पर आ गया .
अरे आदिल तुम?”सिद्धी चौंकते हुए बोली.
क्या तुम आदिल को जानती हो?”साधक ने पूछा.
हाँ हम दोनों कॉलेज में साथ पढ़ते थे परन्तु आपस में कभी बात नहीं हुई.”सिद्धी ने बताया.
हाँ,यह लडकियों के ग्रुप में थी और मैं लड़कों के ग्रुप में इसी कारण कभी आपस में बात नहीं होती थी.”आदिल ने बताया.


“चलो यह तो और भी अच्छा हुआ.कम से कम अजनबीपन तो नहीं रहेगा.मैं भी टेंशन फ्री हो गया.”साधक खुश होते हुए बोला.
“अम्मी ने तुम्हारे लिये यह पांच सौ एक रुपये का नेग भिजवाया हैं.”आदिल रुपये बढ़ता हुआ बोला.

अब तो ले लुंगी यह रुपये.मेरे हक के है.”सिद्धी रुपये लेते हुए बोली.


धीरे धीरे लगभग छह महिने गुजर गये .इस बीच मिसेस अंसारी और सिद्धी के बीच ऐसी कोई विशेष बातचीत नहीं हुई .हाँ दोनों ने एक दूसरे को अपने मोबाईल नम्बर्स जरुर दे दिये थे .कभी राह में आमने सामने मिल जाने पर मुस्कुराहटों का आदान प्रदान भर हो जाया करता था .कभी कभार अकेले में मिल जाने पर सिद्धी सम्मान स्वरुप मिसेस अंसारी के पैर जरुर छू लेती थी .
साधक का निरंतर साप्ताहिक अप डाउन चालू ही था .ऐसे ही एक दिन जब वह अपनी कार से लौट रहा था तो उसकी गाड़ी का भयंकर एक्सीडेंट हो गया और साधक फिर कभी लौट कर ना आ सका .

बेटे की अचानक मौत से साधक की माँ बौखला गई

अभी तक सिद्धी के कदमों को शुभ बता कर तारीफ करने वाली सास की नज़रों में उसके कदम कब अशुभ और मनहूस हो गये सिद्धी को पता ही नहीं चला .सास की नज़रों में सिद्धी अब वह औरत हो चुकी थी जिसके प्रवेश करते ही घर बिखर कर टुकड़े टुकड़े हो गया था .सिद्धी अब बेटे को खाने वाली डायन व चुड़ैल बन चुकी थी .यह मानसिक प्रताड़ना उस के लिये प्रतिदिन का हिस्सा बन चुकी थी .शुरु में उग्र हो कर मारपीट करने वाली साधक की माँ अब रोजाना ही सिद्धी को बात बेबात शारीरिक प्रताड़ना देने लगी थी .


मारपीट के साथ सिद्धी की सिसकियों और साधक की माँ के कर्कश तानों की आवाज़े पास पड़ौसियों के यहाँ पहुंचने लगी .सभी की सहानुभूति सिद्धी के साथ थी मगर घर का अंदरुनी मामला होने के कारण कोई भी हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं था .


आज सुबह से यह तीसरा वाकिया था जब कि सिद्धी की निर्दयता से पिटाई हो रही थी .पड़ौसियों ने कई बार सिद्धी के पिताजी को खबर भी की परन्तु शायद घर पर दो और कुंवारी लड़कियों के होने के कारण उसे अपने घर पर नहीं ले जा पा रहे थे .


आदिल पिछले दो महीनों से सब सुन समझ रहा था .चाहते हुए भी वह अपने दोस्त की मदद करने में असमर्थ महसूस कर रहा था .परन्तु आज अति होते देख उसने कुछ निर्णय लिया .उसने अपनी अम्मी से प्रश्न किया “अम्मी ,सबसे अच्छा मज़हब कौन सा होता है .”
“आदिल मज़हब तो सभी अच्छे है .सभी में अनेकों खूबियां है .लेकिन खुदा जब किसी इंसान को जनम देता है तो उसे सिर्फ एक मज़हब देता है और वो है इंसानियत का .लेकिन हम इंसान उस मज़हब की कद्र ना करते हुए उसे हिन्दू ,मुसलिम ,सिक्ख या ईसाई बना देते हैं .”आदिल की अम्मी ने जवाब दिया .


“अगर आपको बुरा ना लगे और आप मेरा साथ दे तो मै इंसानियत के मज़हब को अपनाना चाहता हूँ .”आदिल ने अपनी अम्मी की तरफ आशा से देखते हुए कहा .
“मतलब ?”अम्मी ने आदिल से पूछा .

मैं सिद्धी की मदद करना चाहता हूं.मै

मैं उससे शादी करना चाहता हूँ.”आदिल ने झिझकते हुए कहा.
“क्या?”आदिल की मम्मी ने आश्चर्य से बोली”सिद्धी एक बहुत ही अच्छी और नेक लड़की है.तुम्हारा इरादा भी नेक है.लेकिन क्या सिद्धी खुद इस बात को मानेगी.तुम्हारी हमदर्दी का वह कोई अलग मतलब ना निकाल ले.यदि वह मान भी गई तो उसके घर ,परिवार व समाज वाले मानेंगे क्या?”


क्या आपको इंसानियत का यह मज़हब मंजूर है.?”आदिल ने पूछा.
मैं मुस्लिम हूँ मुझे फख्र है अपने आप पर .यदि मुझे दोनों मज़हबों में से किसी एक को चुनने को कहा जाय तो मैं इंसानियत का ही मज़हब चुनूंगी .क्योंकि खुदा ने जन्म के समय वह ही मज़हब बख्शा है .”आदिल की द्रढ़ता से बोली .


“बस अम्मी एक बार कोशिश करके देखते है .यदि सिद्धी को मंजूर होता है तो ठीक वर्ना आगे किस्मत उसकी .आप सिद्धी से स्पष्ट बात कीजिये.एक दोस्त एक इंसान होने के नाते मैं उसकी मदद करना चाहता हूँ .”आदिल ने अपनी अम्मी से गुजारिश की .


मैं कोशिश करुँगी और दुआ करुँगी खुदा से की तुम्हारे मंसूबे कामयाब होंगे.

अम्मी ने कहा.
शाम के समय जब साधक की मम्मी सब्जी सौदा वगैरह लेने बाजार गई तब आदिल की अम्मी ने सिद्धी के मोबाईल पर फोन लगाया .अचानक आए फोन से सिद्धी आशंकाओं से घिर गई.उसे उम्मीद थी कि किसी मदद की चाह में आदिल की अम्मी ने फोन लगाया होगा.लेकिन वह स्वयं अपने सास ससुर पर आश्रित है वह उनकी मदद कैसे कर पाएगी ?यही सोचते हुए उसने फोन उठा लिया .

हैलो सिद्धी बेटे मैं आदिल की अम्मी बोल रही हूं.मैं जानती हूं कि तुम ज्यादा बात नहीं कर पाओगी.इसी कारण तुम सिर्फ मेरी बात ध्यान से सुनो.आदिल शादी से पहले तुम्हारा दोस्त था और आज भी है.उससे तुम्हारे दुख देखे नहीं जाते.वह तुम्हारी मदद करना चाहता है.तुम तो जानती ही हो अत्याचार करना गुनाह है तो अत्याचार सहना उससे भी बड़ा गुनाह है.कब तक इस तरह घुट घुट कर और पिट पिट कर जीती रहोगी.आदिल तुम्हें सहारा देना चाहता है तुमसे शादी करना चाहता है.मुझे आदिल के फैसले पर नाज़ है और मैं उसके साथ हूँ.”


मैं तो अभागी हूँ मनहूस हूँ.कल से आपके बेटे को कुछ हो गया तो?

“सिद्धी ने सिसकते हुए कहा.
“मैं ऐसी किसी भी बात को नहीं मानती यदि एक इंसान दूसरे इंसान के लिये मनहूस होता तो अब तक आधी दुनिया ख़तम हो गई होती.जो भी कुछ तुम्हारे साथ हुआ है वह एक दुर्घटना थी.और दुर्घटना हमेशा किसी ना किसी की लापरवाही से ही होती है उसके लिये उस दृश्य से दूर बैठा इंसान जवाबदार कैसे हो सकता है.हर शख्स को अपनी ज़िन्दगी अपनी बेहतरी के बारे में सोचने का पूरा पूरा हक़ है.
अगर तुम आदिल के इस प्रस्ताव से सहमत हो तो अच्छी तरह सोचने व समझने के बाद मुझे मिसकॉल कर देना .हमारे घर में तुम्हारा तहेदिल से इस्तेकबाल रहेगा .”आदिल की अम्मी ने दूर सड़क पर सिद्धी की सास को आते देख कर बात ख़त्म करते हुए फोन काट दिया .

आदिल की अम्मी के इस प्रस्ताव पर विचार करते हुए सिद्धी को रात भर नींद नहीं आयी.उसने सुबह सुबह चार बजे ही आदिल की अम्मी को मिसकॉल देने का साहस जुटा लिया .
आदिल ने पुलिस व प्रशासन को पूरी जानकारी देते हुए एवं प्रमाण के तौर पर अम्मी व सिद्धी के बीच हुई बात की रिकॉर्डिंग प्रस्तुत करते हुए उनके सहयोग से सिद्धी से शादी करली .
कई संघठन इस शादी का विरोध करने आये परन्तु उन सैकड़ों लोगों की भीड़ में से कोई भी इतना प्रगतिशील दिलदार साहसी नहीं था जो एक मनहूस,करमजली विधवा से शादी करने का साहस रखता हो.
शादी के बाद आदिल की अम्मी ने सिद्धी को अपने सासससुर का आशीर्वाद लेने उनके घर भी भेजा किन्तु उन्होंनेदरवाज़ा नहीं खोला.अंततः सिद्धी दहलीज़ को छू कर ही अपने नये ससुराल चली गई .

Story by Harish Jaiswal

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