शिवराज सिंह चौहान : छात्र राजनीति से प्रदेश के मुखिया तक का सफर

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शिवराज सिंह चौहान : छात्र राजनीति से प्रदेश के मुखिया तक का सफर
शिवराज सिंह चौहान : छात्र राजनीति से प्रदेश के मुखिया तक का सफर

मध्यप्रदेश के एक छोटे से क्षेत्र बुधनी में एक किसान परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया था, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आगे चलकर यह बच्चा मध्यप्रदेश की राजनीति का केंद्र बन जाएगा। बुधनी का वो बच्चा छात्र राजनीति से उठकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में पहचान बना गया है। वह बच्चा कोई और नहीं बल्कि मध्यप्रदेश के चार बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान है। प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में रिकॉर्ड बनाने वाले शिवराज सिंह चौहान आज किसी हपचान के मोहताज नहीं है। मुख्यमंत्री रहते हुए मामा के उपनाम से विख्यात होने के बाद भी वे स्वयं एक किसान ही कहते हैं।

कौन है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

Shivraj Singh Chouhan Biography

शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश के वर्तमान राज्य के मुख्यमंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित कार्यकर्ता हैं। वे 23 मार्च 2020 को कमल नाथ के स्थान पर राज्य के चौथी बार मुख्यमंत्री बने।
जीवन परिचय पर एक नजर


बुधनी के किसान परिवार प्रेम सिंह चौहान और माता सुंदरबाई चौहान के यहां 5 मार्च 1959 को शिवराज सिंह चौहान का जन्म हुआ था। शिवराज सिंह ने भोपाल के बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (दर्शनशास्त्र) तक स्वर्ण पदक के साथ शिक्षा प्राप्त की। सन् 1975 में आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, भोपाल (मॉडल हायर सेकेंडरी स्कूल) के छात्रसंघ अध्यक्ष बनने के साथ ही अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत की। आपातकाल का विरोध किया और 1976-77 में भोपाल जेल में निरूद्ध रहे। अनेक जन समस्याओं के समाधान के लिए आंदोलन किए और कई बार जेल गए। सन् 1977 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं। वर्ष 1992 में उनका श्रीमती साधना सिंह के साथ विवाह हुआ। उनके दो पुत्र हैं।


राजनीतिक करियर एक नजर में

सन् 1977-78 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन मंत्री बने। सन् 1975 से 1980 तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के मध्य प्रदेश के संयुक्त मंत्री रहे। सन् 1980 से 1982 तक अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदेश महासचिव, 1982-83 में परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारणी के सदस्य, 1984-85 में भारतीय जनता युवा मोर्चा, मध्य प्रदेश के संयुक्त सचिव, 1985 से 1988 तक महासचिव तथा 1988 से 1991 तक युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे।


जनप्रतिनिधि के रूप में

शिवराज सिंह चौहान 1990 में पहली बार बुधनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। इसके बाद 1991 में विदिशा संसदीय क्षेत्र से पहली बार सांसद बने। शिवराज सिंह चौहान 1991-92 में अखिल भारतीय केशरिया वाहिनी के संयोजक तथा 1992 में अखिल भारतीय जनता युवा मोर्चा के महासचिव बने। सन् 1992 से 1994 तक भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महासचिव नियुक्त। सन् 1992 से 1996 तक मानव संसाधन विकास मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति, 1993 से 1996 तक श्रम और कल्याण समिति तथा 1994 से 1996 तक हिन्दी सलाहकार समिति के सदस्य रहे।


ये 11 वीं लोक सभा में वर्ष 1996 में विदिशा संसदीय क्षेत्र से पुनः सांसद चुने गये। सांसद के रूप में 1996-97 में नगरीय एवं ग्रामीण विकास समिति, मानव संसाधन विकास विभाग की परामर्शदात्री समिति तथा नगरीय एवं ग्रामीण विकास समिति के सदस्य रहे। चौहान वर्ष 1998 में विदिशा संसदीय क्षेत्र से ही तीसरी बार 12 वीं लोक सभा के लिए सांसद चुने गये। वह 1998-99 में प्राक्कलन समिति के सदस्य रहे। ये वर्ष 1999 में विदिशा से चौथी बार 13 वीं लोक सभा के लिये सांसद निर्वाचित हुए। वे 1999-2000 में कृषि समिति के सदस्य तथा वर्ष 1999-2001 में सार्वजनिक उपक्रम समिति के सदस्य रहे।


सन् 2000 से 2003 तक भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। इस दौरान वे सदन समिति (लोक सभा) के अध्यक्ष तथा भाजपा के राष्ट्रीय सचिव रहे। चौहान 2000 से 2004 तक संचार मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति के सदस्य रहे। शिवराज सिंह चौहान पांचवी बार विदिशा से 14वीं लोक सभा के सदस्य निर्वाचित हुये। वह वर्ष 2004 में कृषि समिति, लाभ के पदों के विषय में गठित संयुक्त समिति के सदस्य, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव, भाजपा संसदीय बोर्ड के सचिव, केन्द्रीय चुनाव समिति के सचिव तथा नैतिकता विषय पर गठित समिति के सदस्य और लोकसभा की आवास समिति के अध्यक्ष रहे।


वर्ष 2005 में जीवन में आया नया मोड़


चौहान वर्ष 2005 में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किये गये। चौहान को 29 नवम्बर 2005 को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। प्रदेश की तेरहवीं विधानसभा के निर्वाचन में चौहान ने भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारक की भूमिका का बखूबी निर्वहन कर विजयश्री प्राप्त की। चौहान को 10 दिसम्बर 2008 को भारतीय जनता पार्टी के 143 सदस्यीय विधायक दल ने सर्वसम्मति से नेता चुना। चौहान ने 12 दिसम्बर 2008 को भोपाल के जंबूरी मैदान में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ ग्रहण की।

शिवराज सिंह मुख्यमंत्री के रूप में रिकार्ड


शिवराज सिंह मध्यप्रदेश में सबसे लम्बे समय तक मुख्यमंत्री के रूप मे कार्यभार संभालने वाले पहले मुख्यमंत्री है, शिवराज जी ने 13 वर्ष 17 दिन का मुख्यमंत्री का कार्यभारत सम्भाला है, और वर्तमान मे भी वह 15 महीने के बाद फिर मुख्यमंत्री के पद का दुबारा निर्वाह कर रहे है। इसके अलावा मध्य प्रदेश मे सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड भी उन्होंने अपने नाम कर लिया है। 23 मार्च को शिवराज जी ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके पहले ये रिकार्ड अर्जुन सिंह और श्यामाचरण शुक्ल जी के पास था। ये मध्य प्रदेश के तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके है। 24 मार्च 2020 शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट के विधायकों के समर्थन से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।


विवादों से भी रहा है नाता


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का विवादों से भी नाता रहा है। चाहे फिर वो डंपर कांड हो या फिर व्यापंम भर्ती घोटाला रहा हो। इन विवादों में उनका नाम काफी उछला था। यहां बता दें कि कांग्रेस नेता और वकील रमेश साहू की शिकायत पर भोपाल कोर्ट ने मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी साधना सिंह के खिलाफ 2007 में ‘‘डम्पर घोटाले‘‘ में जांच का आदेश दिया था। उनका आरोप था कि साधना सिंह ने कथित तौर पर 2 करोड़ रुपये में चार डंपर्स खरीदे थे और बाद में उन्होंने एक सीमेंट फैक्टरी को किराये पर दे दिया था। उनपर यह भी आरोप था कि उन्होंने जाँच के दौरान एक झूठा आवासीय पता प्रदान किया और एसआर सिंह के नाम से अपने पति का झूठा नाम रखा। इसके बाद, लोकायुक्त पुलिस ने आईपीसी की धारा 420 के तहत मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मामला दर्ज करते हुए मामले की जांच शुरू कर दी। हालांकि, 2011 में, अपर्याप्त साक्ष्य के कारण दोनों को आरोपों से मुक्त कर दिया गया था।


वर्ष 2009 में, इंदौर के एक चिकित्सक एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ आनंद राय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। जिसमें उन्होंने व्यापम भर्ती घोटाले पर प्रकाश डाला। उस जनहित याचिका के सन्दर्भ में शिवराज सिंह चौहान ने एक जांच समिति की स्थापना की। जिसने वर्ष 2011 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके उपरांत वर्ष 2013 में आनंद राय ने कहा कि इस घोटाले में कई ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्होंने मध्य प्रदेश के चिकित्सक संस्थानों में फर्जी ढंग से प्रवेश प्राप्त किया है। जिसके चलते उच्च न्यायालय की देखरेख में विशेष कार्य बल (एसटीएफ) का गठन किया गया। वर्ष 2015 में, सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष कार्य बल से केस को केंद्रीय अन्वेंषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया। सीबीआई की जाँच में शिवराज सिंह चौहान का नाम भी सामने आया। परन्तु वर्ष 2017 में, सीबीआई द्वारा उन्हें क्लीन चिट दे दी गई। हालांकि, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सीबीआई की जांच पर सवाल उठाते हुए कहा कि सीबीआई द्वारा शिवराज सिंह चौहान को बचाते हुए सबूतों से छेड़छाड़ की गई।


शिवराज सिंह चौहान – व्यापम घोटाला


राज्य से बाहर के लोगों को मध्य प्रदेश में काम ना करने देने के विवादास्पद बयान से शिवराज सिंह चौहान ने क्षेत्रीयवाद की राजनीति का परिचय दिया। जिसके चलते उन्हें कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। हालांकि बाद में उन्होंने अपने इस बयान को स्पष्ट करते हुए कहा कि,‘‘मध्य प्रदेश सभी का स्वागत करता है।‘‘
जून 2017 में, मध्य प्रदेश में किसानों द्वारा कृषि आधारित अपनी मांगों को लेकर शांति पूर्ण धरना-प्रदर्शन किया जा रहा था कि अचानक किसानों द्वारा इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया। जिसके चलते पुलिस द्वारा गोलियां चलाई गई जिससे पांच किसानों की मौत हो हो गई। हिंसा शांत होने की बजाए और भड़क उठी। जिससे नाराज किसानों का प्रदर्शन मंदसौर के अलावा प्रदेश के कई अन्य जिलों तक फैल गया। इस आंदोलन को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दशहरा मैदान पर 28 घंटे का उपवास रखते हुए लोगों को संबोधित किया और कहा कि ‘‘प्रदेश में सरकार द्वारा किसानों के कल्याण का कार्य किया जा रहा है और सरकार हमेशा किसानों के साथ है।‘‘ जिस पर कांग्रेस पार्टी के नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट करते हुए कहा कि, “उपवास की बजाय पुलिस को नियंत्रित करें। किसानों पर लगाए गए झूठे मुकदमे वापस लें और किसानों की मांगें मंजूर करें। अपनी नौटंकी करना बंद करें।‘‘


शिवराज सिंह चौहान भूख हड़ताल पर

जनवरी 2018 में, शिवराज सिंह चौहान तब विवादों में आए जब उन्होंने सरदारपुर रैली के दौरान सार्वजनिक रूप से अपने अंगरक्षक को थप्पड़ मारा।