एक और कंपनी हुई “डिफाल्टर” बैंकों के फंसे 3972 करोड़

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कानपुर
उद्योगपति विक्रम कोठारी की रोटोमैक के बाद कानपुर में एक और कंपनी “3972 करोड़ रुपए” डकारते हुए डिफाल्टर हो गई है। टेक्सटाइल और डिफेंस मैटेरियल का उत्पादन करने वाली श्रीलक्ष्मी कॉटसिन लिमिटेड में 16 बैंकों के अरबों रुपए एनपीए नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स के रूप में फंस गए हैं। कर्ज देने वाले कंसोर्टियम की तरफ से सेंट्रल बैंक ने अरबों की वसूली के लिए नीलामी प्राक्रिया शुरू कर दी है।
यह मामला विक्रम कोठारी से भी बड़ा है। कोठारी पर तो “3695 करोड़ की बैंक” धोखाधड़ी का आरोप है। यह आंकड़ा खुद लक्ष्मी कॉटसिन लिमिटेड की 31 मार्च 2017 की बैलेंस शीट बता रही है। श्रीलक्ष्मी कॉटसिन लिमिटेड का पंजीकृत दफ्तर जीटी रोड स्थित कृष्णापुरम में है। ग्रुप के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक डॉ. एमपी अग्रवाल हैं। पवन कुमार अग्रवाल संयुक्त प्रबंध निदेशक और देवेश नारायण गुप्ता उपप्रबंध निदेशक हैं। श्री लक्ष्मी कॉटसिन की चार फैक्ट्रियां फतेहपुर जिले के मलवां, औंग, अभयपुर और रेवाड़ी बुजुर्ग में हैं। टेक्सटाइल के 20 उत्पादों के अलावा कंपनी वाहनों को ब्लास्ट प्रूफ बनाने का काम भी करती है।
बुलेट की रफ्तार से दौड़ रही कंपनी की हालत लगभग चार साल पहले डांवाडोल होना शुरू हो गई थी। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में छायी मंदी और क्षमता से ज्यादा विस्तार करने से हालत खस्ता होती चली गई। एक लोन को डिफाल्ट होने से बचाने के लिए बैंकों ने आंख मूंदकर दूसरा लोन दे दिया। यह सिलसिला चलता रहा और आखिरकार कर्ज के भारी बोझ तले श्री लक्ष्मी कॉटसिन बैठ गई। बैंकों ने कर्ज की वसूली के लिए बंद हो चुकी चार इकाइयों में से दो को बेच दिया है। लेकिन इससे जुटी रकम बहुत कम है। 3972 करोड़ की वसूली के लिए सेंट्रल बैंक इस मामले को सबसे पहले डीआरटी में ले गया, फिर 30 नवम्बर 2016 को सिक यूनिट के तहत समझौते के लिए इस केस को एनसीएलटी में ट्रांसफर कर दिया गया था।
कंपनी का घाटा 1646.12 करोड़ रुपए है। दीर्घ अवधि का लोन 2406 करोड़ रुपये है, जबकि शॉर्ट टर्म लोन 937 करोड़ रुपये है। इतने बड़े कर्ज की वसूली के लिए बैंलेस शीट के हिसाब से कंपनी की कुल संपत्ति मात्र 1495 करोड़ रुपये है। यह वसूली भी तभी संभव है, जब बुक वैल्यू पर यह बिक जाए। बैंकों में श्री लक्ष्मी कॉटसिन के मात्र 2.54 करोड़ रुपये जमा हैं। कंपनी चलाने का खर्च 577 करोड़ रुपये हैं। कुल आय मात्र 311 करोड़ रुपये है। साफ है कि कंपनी वेंटिलेटर पर आखिरी सांसें गिन रही है।
यह सब इसलिए हुआ कि जिस मद में लोन दिया गया, उसकी क्रॉस चेकिंग करना बैंकों की जिम्मेदारी है। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया कंसोर्टियम का लीड बैंक है। 16 बैंकों के इस कंसोर्टियम में सिंडीकेट बैंक, यूनियन बैंक, केनरा बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक, इंडियन बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एक्जिम बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, आईडीबीआई बैंक, विजया बैंक, कारपोरेशन बैंक, सारस्वत बैंक, आंध्रा बैंक और एडिलवाइस एसेट रीकंस्ट्रक्शन लिमिटेड शामिल है।

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