भोपाल की बेगमों ने किया यहाँ विकास और तहजीब

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नईम कुरेशी
एक दौर में भोपाल नवाबशाही व बेगमों के शहर होने का फक्र हासिल था पर आज वो उससे भी आगे बढ़कर बगीचों और तालाबों का शहर के नाम पर उत्तर भारत में चर्चित है। भोपाल वो शहर है जहाँ से देश दुनिया में मशहूर हॉकी खेल का विकास हुआ। यह वही शहर है जहाँ की रानी कमला होती थीं और ये ताज-उल-मसाजिद का शहर भी माना जाता है। इसी शहर में जहाँ 100 साल पहले जनरल उबेदुल्लाह खॉन जैसे हॉकी प्रेमी थे वहीं आम लोगों के खास राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी हुए थे। यहीं अफसरशाहों के बादशाह एम.एन. बुच साहब, निर्मला बुच, अजयनाथ, सुधीरनाथ आदि भी भोपाल के ही रहे हैं। भोपाल जहां आज म.प्र. की सियासत का केन्द्र व सूबाई राजधानी भी है। यहां मार्शल टीटो, जयप्रकाश नारायण, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू जैसे लोगों ने आकर यहां की मेहमान नवाजी का लुत्फ उठाया था। डॉ. सर मोहम्मद इकबाल और नवाब भोपाल की गहरी दोस्ती को भी यहां के साहित्यकारों व इतिहासकारों ने अपने अफसानों में दर्ज किया है। सर मोहम्मद इकबाल जहां शायरी और साहित्य के रत्न थे वहीं वो हिन्दू-मुस्लिम एकता के भी एक पैगम्बर समान थे। उनके पूर्वज हिन्दू ब्राम्हण थे। उन्होंने अपनी शायरी के चन्द बोलों में कहा- मैं असल का खास सोमनाती। आबा मेरे लातियों मनाती तू सैयद हाशमी की औलाद, मेरी कफे खाक बरहमनजाद। डॉ. सर मोहम्मद इकबाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के मशहूर वकील सर तेजबहादुर सपरू के घराने से थे। मार्शल टीटो भी आये भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खॉन अपनी योग्यता की वजह से ही “चेम्बर ऑफ प्रिन्सेस” के चान्सलर रहे थे। हिन्दुस्तान के सभी राजा नवाबों में वो काफी लोकप्रिय रहे थे। साथ-साथ अंग्रेजी शासन के अफसरान भी उनके खास दोस्तों में रहे थे जिससे भोपाल में सबसे पहली रेल लाईनों को बिछा दिया था और नवाबों की तरफ से इसमें 35 लाख की भारी धनराशि खर्च की गई थी। चिकलोद भोपाल से 60 किलोमीटर की दूरी पर एक बड़ा घना जंगल था जहां शेर, तेंदुए, हिरण, चीतल आदि बड़ी तादातों में थे। यहां नवाबों ने बड़े-बड़े बगीचे लगा रखे थे। यहां शिकार के लिये तमाम बड़े लोग आते रहते थे, जिसमें मार्शल टीटो जो योगोस लाविया के पहले राष्ट्रपति थे व रोमन के थोलिक थे। वे कम्यूनिष्ट विचारों के भी थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव भी डाली थी। वो भी भोपाल आकर चिकलोद में नवाब भोपाल के मेहमान बनाये गये थे। इससे भोपाल शहर व यहां की भूमि का मान बढ़ा था। मिर्जा गालिब जैसे देश दुनिया के मशहूर शायर थे। मिर्जा गालिब का ग्वालियर के एक जमीरदार हज़रत जी से भी काफी दोस्ताना था और वो उन्हें काफी लम्बे-लम्बे खत भी लिखा करते थे। “बीते दिन भोपाल” किताब के लेखक खालिद मोहम्मद खॉन के अनुसार गालिब का भोपाल से भी गहरा संबंध रहा था। जब नवाब जीनत महल के बेटे मिर्जा जवाँबखत की शादी हुई तो मिर्जा गालिब ने उनकी शान में एक सैहरा लिखा गया था, जिसमें चन्द लाइनें ये थीं- खुश हो अम बख्त के है आज तेरे सर सैहरा। बांध शहजादे जवांबख़त के सर पर सैहरा क्या ही इस चांद से मुखड़े पे भला लगता है। है तेरे हुस्न दिल अफ़रोज का जेवर सैहरा।
डॉ. भोपाली आजादी के मतवाले
मिर्जा गालिब की भोपाल से नजदीकी के बारे में उर्दू अदब की काबिसतरीन सख्सियत अब्दुल कवी दसनवी साहब द्वारा उनकी किताब “भोपाल और गालिब” में विस्तार से लिखा है। भोपाल में देशभर में अदीबों, शायरों के आने का सिलसिला शुरू से ही बना रहा था। 17वीं सदी में ही जब देशभर के राजा नवाब अपनी दौलत खजाने में जमा करते थे तब भोपाल के नवाब और बेगम भोपाल में डाक तार मेहकमों व रेलों से यहां की आवाम को राहतें दे रही थीं। यहां का व्यापार बढ़ाया जा रहा था। अंग्रेजों के दौर में अलीगढ़ के “मरसान” कस्बे के राजा महेन्द्र प्रताप सिंह भी भोपाल रियासत के मेहमान रहे थे। उन्हें मुगल बादशाहों ने राजा की पदवी प्रदान की थी। राजा साहब ने अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाई थी जिससे उन्हें अपनी काफी जमीनों से हाथ धोना पड़ा था पर वो भोपाल के नवाबों के दोस्त रहे थे जिससे वो अक्सर भोपाल आते रहे थे और बरकत उल्ला भोपाली के साथ अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने लगे थे। डॉ. बरकत उल्ला भोपाली इंग्लैण्ड, बर्लिन, मास्को, टोकियो आदि में रहकर भारत की आजादी का बिगुल बजाते रहे थे।आज भोपाल में लॉ इंस्टीट्यूट, आदिवासियों के नाम पर बड़ा म्यूजियम, पुलिस अमलों के लिये बड़े ऑफियों से लेकर ओपन विश्वविद्यालय, पत्रकारिता विश्वविद्यालय, एकांत जंगलों का बड़ा बाग, मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट, उर्दू अकादमी, हिन्दी भवन, रीजनल साइऔस भवन, श्याम हिल्स व चार ईमली पर बने भव्य बंगलों की लम्बी फेहरिश्तों से जंगलात मेहकमे के भी संस्थान भोपाल की शान बन चुके हैं। चार्ल्स कोरिया नामक विश्वप्रसिद्ध ऑर्किटेक्ट ने भी यहां भव्य विधानसभा भवन बनाकर यहां की शान बढ़ाई है।

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