उस पर फैसला देने में करीब साढ़े चार माह का विलंब क्यों किया गया

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श्री सिंघवी ने कहा कि कोलेजियम को सरकार से यह भी पूछना चाहिए कि उसने न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम की सिफारिश जनवरी में भेजी थी तो उस पर फैसला देने में करीब साढ़े चार माह का विलंब क्यों किया गया। यदि उनकी सिफारिश दोबारा खारिज की जाती है तो विधि सचिव के खिलाफ अवमानना का नाेटिस देना चाहिए। यदि उनकी सिफारिश खारिज हो जाती है तो काेलेजियम को सभी नियुक्तियाें पर रोक लगा देनी चाहिए।
पूर्व चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के एक फैसले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि एक बार उनकी पसंद के अधिकारियों की नियुक्ति न किये जाने श्री शेषन ने चुनाव कराने से ही मना कर दिया था । अब समय आ गया है जब न्यायपालिका को भी इसी तरह कदम उठाना चाहिए।
न्यायमूर्ति जोसेफ की पदोन्नति न किये जाने के श्री प्रसाद की ओर से गिनाये गये कारणों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय स्तर पर वरिष्ठताक्रम कभी भी आधार नहीं रहा है। यदि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति को नुमाइंदगी देेनी थी तो जिन न्यायाधीश की नियुक्ति की गयी है वह उस कसौटी पर खरी नहीं उतरती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी न्यायमूति मल्होत्रा के खिलाफ नहीं है। उच्च न्यायालयाें की नुमांइदगी की बात भी बेमानी है।
नीलिमा सत्यावार्ता

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